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Tuesday, October 17, 2017

मैं उड़ना चाहती हुं ...



मैं उड़ना चाहती हुं
दुर कहीं जाना चाहती हुं...
मुक्त गगन में
अकेले....
बिना किसी सहारे
अपनी मंजिल को पाना चाहती हुं
मत रोको मुझे
उड़ने दो...
मुझे अपने पंख फैलाने दो
पिंजरा नहीं...
मुझे खुला आकाश चाहिए.
जीने के लिए जमीं का साथ चाहिए
मेरे पंख मत कतरो
मुझे भी आजाद होने का हक है
हक है बेफिक्र उड़ने का
खुली हवा में सांस लेने का
मैं उड़ना चाहती हुं
मुझे उड़ने दो
मुक्त गगन में ।।

Written by Radha

मेरी प्यारी सखी (कलम)


ओ री सखी
मेरी प्यारी सखी
तु कितनी सच्ची है...
मेरे जीने का आधार है
तु है , तो मैं हूं
तुझ बिन मेरा कौन यहां
सुनता कोई बात है...
तु मेरी आवाज़ है
तु जीने का सार है
तु हर ग़म की साथी
तु हर खुशी की साज़ है...
मेरी हर एक-एक आंसुओं का
तु ही लब्जेबयां है
तु हर जगह है...
तु हर वक्त है...
तु ही इतिहास है...
तु ही आज है...
मैं खुश हूं तो तु है
मैं रोऊं तो तु है
मैं उदास हूं तो तु है
मैं शांत हूं तो तु है...
जीने के हर एक छन में
तु मेरे साथ है
ओ री सखी
मेरी प्यारी सखी
तु कितनी अच्छी है ।।




                                                                                                                रचना- राधा रानी

दीया..


मिट्टी मेरी आत्मा है
दो हाथ मेरे जन्मदाता
खुद को जलाकर...
करती हूं रौशन...
मंदिर और घर-आंगन
पर ये बात हो गई पुरानी
पुरानी हो गई मिट्टी
थक गए वो हाथ
बदल गई वो नज़रें
जिनके घर होता था मुझसे
त्योहारों का दशहरा।।

रचना-राधा रानी...

ये मेरी कविता उस दीया को समर्पित है, जो खुद को जलाकर दुसरों के घर में रौशनी भर देती है। हर पर्व त्यौहारों में इनका जलना शुभ माना जाता है। इनसे निकली रौशनी पुरे वातावरण को शुद्ध कर देती है। बिना इनके कोई भी पुजा अधुरी होती है। इनकी चमक से घर-आंगन का कोना-कोना चमक उठता है। पर आज इनकी चमक कहीं खो सी गई है।
इसका कारण बस एक ही है... लोगों का बदलता नजरिया। लोग आज बाहरी चकाचौंध पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। रंग बिरंगी लाइट्स लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे है। जिसके कारण विदेशी दीया के आगे हमारी देशी दीया फिकी पड़ती जा रही है। इस चकाचौंध के आगे सिर्फ देशी दीया ही नहीं बल्कि उनको बनाने वाले हाथ भी इन चमक में कहीं खोते जा रहे हैं । जहां हम अपने घर में रौशनी भर रहे होते हैं, वहां वो अपने बनाये दीयों में तेल को तरस जाते हैं। पर्व-त्योहार , इनके घर रौशनी भरी खुशियां नहीं बल्कि अंधेरों भरा गम लेकर आतें हैं।
पर इनका ये अंधेरा हम खुशियों से भर सकते हैं। बस एक पहल करनी होगी...हम अपनी खुशियों को मिट्टी के दीप से ही रौशन करें तो।
करेंगे ना आप...?

Written by: Radha Rani

ढकियानुसी बातें !......

भगवान ने औरत और मर्द दोनों को बनाया है... दोनों एक ही हारमांस के बने हैं ...पर कुछ ढकियानुसी बातों को सिर्फ औरतों को ही क्यों झेलना पड़ता है??

जैसे कि, सबको खिलाकर खाना खाने की बात....यार मैं कहती हूं कि क्या उनको पहले भुख नहीं लग सकती?? क्या जरुरी है सबको खाने के बाद खाने की... ये हर घर की बात नहीं है...कुछ पुरानी मानसिकता वाले लोगों की वजह से कुछ औरतों को झेलना पड़ता है...

अगर उनको पहले मुख लगी तो अपना पेट दबाए, मुंह पर मुस्कान चढ़ाए..सबका हुकुम बजाना पड़ता है...

ज्यादा से ज्यादा आप हवा खा सकते हैं... थोड़ा पेट तो भर ही जाएगा... अगर भुल से भी पहले खा लिया तो आपको सुनना पर सकता है कि बेल्लज है, बेशर्म है, मायके से मां ने यही सिखाया है, ससुराल को ससुराल नहीं समझती, इत्यादि...
हा हा हा....

वाह री दुनिया....
और तो और इन औरतों की दुश्मन एक औरत ही होती है...जो भुल गयीं होती हैं कि वो भी एक औरत है.
... राधा...

दिमाग है तो उसका अचार डालू


ये मत करो..
वो मत करो..
यहां मत जाओ...
वहां मत जाओ...
ठीक से बोलो...
एक दम पागल है...
दिमाग से काम लो...
ये सारी बातें एक लड़की को शादी से पहले मां-बाप से सुनने को मिलती है और शादी के बाद पति से..
यार क्या न करुं और क्यों न जाऊं ... भगवान ने दिमाग दिया है तो उसका इस्तेमाल तो करुंगी ही...उसका अचार तो नहीं डालुगीं ।
अकसर लड़कीयों के साथ ही ऐसा होता है.. लोगों के मन में बैठ गया है
कि लड़कियां जो भी करेगी गलत ही करेगी... क्योंकि उनके पास दिमाग कम है...
अरे भई आपको कैसे पता हमें दिमाग कम है...क्या हमारे दिमाग का वजन करा रखा है??
जो दिमाग आपके पास है, वहीं हमारे पास भी है...बस अपना सोच हमारे प्रति बदल दीजिए...
कृपया कर आप हमें दिमाग का इस्तेमाल आजादी के साथ तो करने दीजिए...हमें थोड़ा आजादी से कुछ नया करने तो दीजिए... हमें अपनी सोच से आगे तो बढ़ने दीजिए...तब जरुर लड़कियों की सोच पर भरोसा हो जाएगा ।




.... राधा....

Tuesday, September 26, 2017

मेरा लाल


तु है लाल मेरा
तुझसे है मेरी दुनिया
तु मेरी दुवाओं का
आशिर्वाद है
मेरी हर एक सांस
अब तेरा कर्जदार है
तु जब हंस दे
तो दिन है और रात है
तेरी हर एक अदा पर
मेरी जान निसार है
तु खेले खेल-खिलौने
पर मेरा खिलौना है तु
तेरा हंसना
तेरा रोना
तेरी बदमाशियां
आज सब पर मुझे प्यार है 
तु है लाल मेरा।।


Written by Radha

बाइकर्स



पहले तो कहा जाता था कि चार पैर वाले दो पैर वालों से ज्यादा तेज होते हैं...वो फटाफट कहीं भी -जा सकते हैं...मगर आज जमाना कुछ उल्टा ही चल रहा है... दो पैर वाले हवाई जहाज जैसे उड़ान भरने लगें हैं... इनके आगे तो हवाई जहाज भी शर्मिंदा हो जाए ... ये दो पैर वाले हम जैसे दो पैर वालों के नाक में दम कर के रखा है... इनसे हमें डर-डर कर चलना पड़ता है, पता नहीं कब ये आए और हमें लंगड़ी मार के निकल जाएं


अब तो आप समझ ही गए होंगे... मैं किसकी बात कर रही हूं...


जी हां ... आज के जमाने के बाइकर्स... लगता है इनके मां बाप ने इनको बाईक नहीं हवाई जहाज दे दिया हो... ऐसे सड़क पर बाईक चलाते हैं जैसे सड़क उनके बाप की हो... और तो और बाईक स्टंट भी करने लगते हैं... जैसे उनको देख लगता हो कि, किसी बात का गुस्सा निकाल रहे हों बाईक से।

वो ये नहीं देखते कि सड़क पर और भी गाडियां चलतीं हैं...लोग चल सकते हैं...पर उनको इसका कोई फ़िक्र नहीं... आज सड़क किनारे खड़े होने पर भी डर लगने लगा है...डर का कारण इनका बाईक को जिगजैग कर के चलाना।

अरे भाई ये बाईक है कोई हवाई जहाज नहीं, जो उड़ा रहे हो।

हमें हमेशा कहा जाता था कि सड़क किनारे से चलना , सड़क के बीच मत चलना...पर अब हमारे परिजन क्या कहेंगे...यही कि घर से बाहर मत निकलना।

अरे इनके परिवार वालों को समझाना चाहिए कि , ये खुद तो मरेंगे, साथ साथ दुसरों को भी मारेंगे।


Written by Radha