Wednesday, June 6, 2018

मेरे अंदर का बच्चा


मेरे अंदर का बच्चा
अबतक वो बढ़ा नहीं
दुनिया की साजिशों से
अबतक वो मिला नहीं
मेरे अंदर का बच्चा
झट‌ से दोस्त बनाता है
नासमझ है अभी वो
हरवक्त धोखा खाता है
मेरे अंदर का बच्चा
हर पल धुम मचाता है
हरपल कुछ नया करने को
नए-नए तरकीब लगाता है
मेरे अंदर का बच्चा
अपना बचपन भुला नहीं
बचपन की यादों को वो
फिर से वो दोहराता है
मेरे अंदर का बच्चा
अब तक वो मरा नहीं।

Written By Radha Rani

Tuesday, June 5, 2018

एक गिलहरी आंगन में















एक गिलहरी आंगन में
रोज-रोज आ जाती है
अपने नन्हें कदमों की
छाप वो दे जाती है
फुदक-फुदक कर आंगन में
इठलाती बलखाती है
हरपल वो मेरे मन में
एक नया उत्साह जगाती है
एक गिलहरी आंगन में
रोज-रोज आ जाती है

जब भी उसको देखुं तो
मन मेरा कर जाता है
उसको लेकर हाथों में
उसके बदन को सहलाऊं
पर वो इतनी तेज है
कभी नहीं आती हाथों में
पलक झपकते ही झट से
वो गायब हो जाती है
एक गिलहरी आंगन में
रोज-रोज आ जाती है।

Written By Radha Rani

Monday, June 4, 2018

चिड़िया घर से निकली है...

चिड़िया घर से निकली है
मुक्त गगन में उड़ने के लिए
अपने प्यारे पंख फैलाए
नए-नए सपने सजाए
आशाओं के दीप जलाए
प्यारी चिड़िया निकली है।


एक अनोखी उड़ान के लिए
अपनी आकांक्षाओं के लिए
नीत नए सपनों को बुनकर 
उनको पुरा करने
वो चिड़िया निकली है।


चिड़िया घर से निकली है 
गिद्ध की नजरों से बचती
अपने पंख हवा में फैलाए
ठंडी हवा में शान से
मासुम चिड़िया निकली है।

Written By Radha Rani

Thursday, May 31, 2018

हारी नहीं हूँ मैं


बेशक हार हुई है मेरी
पर हारी नहीं हूँ मैं
मुझको लाचार न समझो तुम
बेचारी नहीं हूँ मैं
रुकी हूँ, गिरी हूँ, ज़मीं पर पड़ी हूँ
पर ज़िंदा हूँ अभी,
किस्मत की मारी नहीं हूँ मैं
फिर उठूँगी, बढ़ूँगी,
फ़लक तक चढ़ूँगी
मैं  सूरज हूँ, 
उगना ढलना आदत है मेरी
टूट के पल में  खो जाये
वो तारा नहीं हूँ मैं
बेशक हार हुयी है मेरी
पर अभी हारी नहीं हूँ मैं.....


........Radha...........

मैंने एक सपना देखा


Monday, May 21, 2018

तबे एकला चलो रे

यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।....

जब आपका कोई साथ ना देे...
तो वो मेरे मन तु अकेले ही चल।
जब तुम्हारे हर बात को गलत समझा जाए...
तो वो मेरे मन तु अकेले ही चल।
जब आपको हमेशा तिरस्कार की नजर से देखा जाए...
ओ वो मेरे मन तबभी तु अकेले ही चल।
जिंदगी बड़ी कठिन है...इन कठिन रास्तों पर...
ओ मन तु अकेले ही चल।
कभी तुम पीछे छुट जाओ, और कोई आवाज ना दे...
तो वो मेरे मन तु अकेले ही चल। 
जब सब रास्तों के दरवाजे बंद हो जाएं...
तो वो मेरे मन एक नए रास्ते पर ...
तु अकेले ही चल।

मैं हमेशा से "तबे एकला चलो रे" पर विश्वास करती आईं हूँ...बचपन से इतने उताड़ चढ़ाव देखें हैं की किसी पर विश्वास होता ही नहीं...वो चाहे भगवान ही क्यों न हो...

बचपन से लेकर आज तक सारे फैसले खुद लेती आई...अच्छे बुरे की पैहचान करती आई...अपना भला बुरा खुद देखती आई ...तो अब किसी की थोड़ी सी भी कड़वी बात अच्छी नहीं लगती...मुझे शांती से जीना पसंद है...

किसी की चुगली करना पसंद नहीं...किसी को गाली देना पसंद नहीं...किसी के भोले पन का फायदा उठाना पसंद नहीं...और ये सारी ना पसंद बातें मुझे आज घेरे हुए था...सो फिर से मैंने 'एकला चलो रे' का नारा बलंद कर दिया है...


यदि तोर डाक शुने केऊ न आसे
तबे एकला चलो रे।

एकला चलो, एकला चलो, एकला चलो रे!
Written By Radha Rani

अब भी दिल रो देता है

अब भी दिल रो देता है जब भी उन गलियों से गुजरती हूं तेरे होने का एहसास होता है अचानक से कदम खुद रुक जाते हैं और मैं वहीं एक टक तुम्हें वही ढु...